आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने एक बहस खड़ी कर दी है। एक तरफ तो डॉग बाइट के बढ़ते मामले के बीच इस फैसले से राहत की उम्मीद जताई जा रही है। तो वहीं दूसरी ओर पेट लवर्स और संस्थाएं इसकी आलोचना कर रही हैं। पशुओं के प्रति प्रेम भाव रखने वाली बीजेपी की पूर्व सांसद और एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट मेनका गांधी ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना की है।
उन्होंने फ्रांस की राजधानी पेरिस की 1880 के दशक में हुई घटना का जिक्र करते हुए कहा कि अगर कुत्ते चले गए तो शहर में हर जगह बंदर घूम रहे होंगे। आज कुत्तों के डर से बंदर पेड़ से नहीं उतरते। मेनका गांधी ने कहा कि पेरिस में 1880 में कुत्ते बिल्लियों को मार डाला। एक हफ्ते के अंदर कोई उस शहर में नहीं रह पाया।
नालों में चूहे भर गए थे। आखिरकार कुत्ते बिल्लियों को वापस लाना पड़ा। क्या सच में पेरिस में ऐसा किया गया था और चूहों की संख्या बढ़ने के चलते कुत्ते और बिल्लियों को वापस लाना पड़ा था? आइए जानते हैं कि आखिर 1880 के दशक में क्या हुआ था। 1880 के दशक में पेरिस में क्या हुआ था जब ढेर सारे आवारा कुत्तों को मार दिया गया। और क्या सचमुच इसके बाद चूहों ने शहर को तहस-नहस कर दिया। पेरिस 1880 का दशक फ्रांस की यह खूबसूरत राजधानी उस वक्त बदलाव के दौर से गुजर रही थी। शहर को साफ सुथरा और मॉडर्न बनाने की होड़ थी। लेकिन एक समस्या थी आवारा कुत्ते। जी हां, उस वक्त पेरिस की सड़कों पर ढेर सारे आवारा कुत्ते घूमते थे। यह कुत्ते ना सिर्फ गंदगी फैलाते थे बल्कि रेबीज जैसी खतरनाक बीमारी का डर भी बढ़ा रहे थे।
साथ ही घोड़ों को डराने की वजह से सड़कों पर हादसे भी हो रहे थे। तो पेरिस की पुलिस और प्रशासन ने फैसला लिया इन कुत्तों को हटाना होगा। 1883 में एक फार्मासिस्ट एमिले कैपोन ने खुलकर कहा कि आवारा कुत्तों की वजह से रेबीज का खतरा बढ़ रहा है। बस फिर क्या था? प्रशासन ने बड़े पैमाने पर कुत्तों को मारना या शहर से हटाने का आदेश दे दिया। अब कहानी में ट्विस्ट आता है। एक पुरानी कहानी के मुताबिक कुत्तों को हटाने के बाद पेरिस में चूहों का आतंक बढ़ गया। नालों, गलियों यहां तक कि लोगों के घरों में चूहे घुसने लगे। कहते हैं कि हालात इतने खराब हो गए कि लोग शहर छोड़कर भागने लगे और फिर चूहों को कंट्रोल करने के लिए कुत्तों और बिल्लियों को वापस लाना पड़ा। लेकिन रुकिए। क्या यह कहानी पूरी सच है? चलिए फैक्ट चेक करते हैं। रिसर्च की मानें तो 1883 में पेरिस में रेबीज कंट्रोल के लिए आवारा कुत्तों पर कारवाई के सबूत मिलते हैं।
यह बात जे स्टोर के एक रिसर्च पेपर में लिखी है। जिसका टाइटल है स्ट्रेट डॉग्स एंड द मेकिंग ऑफ मॉडर्न पेरिस। लेकिन बिल्लियों को मारने का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिलता। यानी कुत्तों को तो निशाना बनाया गया पर बिल्लियों की कहानी शायद बाद में जोड़ी गई। और हां, चूहों की वजह से लोग शहर छोड़कर भागे, इसका भी कोई ठोस सबूत नहीं। हां, यह अनुमान जरूर लगाया जा सकता है कि कुत्तों के कम होने की वजह से चूहों की तादाद जो है वो बढ़ गई। क्योंकि कुत्ते और बिल्लियां चूहों को कंट्रोल करते हैं। लेकिन यह कहना कि पूरा शहर चूहों की वजह से खाली हो गया। शायद थोड़ा बढ़ा चढ़ाकर कहा गया है।
अब सवाल यह है कि बिल्लियों को मारने की बात कहां से आई? 1984 में अमेरिकी इतिहासकार रॉबर्ट डॉनटन की किताब द ग्रेट कैट मैस्कर में एक कहानी है। लेकिन ध्यान दें यह 1880 की नहीं 1730 की बात है। तब पेरिस में प्रिंटिंग प्रेस के मजदूरों ने मालिकों के खिलाफ गुस्से में पालतू बिल्लियों को मारा था। यह कोई सिटी वाइल्ड कत्लेआम नहीं था बल्कि एक प्रतीकात्मक विरोध था। ।
