नहीं रहे मुकुल देव, अपने पीछे इतने करोड़ की संपत्ति छोड़ गए !

साल 2025 की एक शांत सुबह थी घड़ी की सुइयां जैसे थम गई थी और अचानक हर न्यूज़ चैनल पर एक ही हेडलाइन चल रही थी बॉलीवुड अभिनेता मुकुलदेव का निधन पीछे छोड़ी करोड़ों की संपत्ति और इकलौती बेटी बहुत से लोगों के लिए यह खबर एक सामान्य सी शोक सूचना थी लेकिन इंडस्ट्री के भीतर जो लोग उन्हें जानते थे आई घर खुशियां लाई है रहने वाली रात अपने घर खुशियां उनके लिए यह खबर सिर्फ एक निधन नहीं थी यह एक पूरे युग का अंत था।

एक ऐसे कलाकार की विदाई थी जो हर किरदार में खुद को इस कदर ढाल लेता था कि दर्शक सच्चाई और अभिनय के बीच फर्क ही भूल जाते थे मुकुल देव एक ऐसा नाम जो कभी लाइट कैमरा और एक्शन के बीच झुका नहीं और ना ही खुद को खोया वो ना तो किसी खान की तरह इस डार्डम के शिखर पर पहुंचे और ना ही किसी कपूर की तरह बॉलीवुड खानदान का हिस्सा थे।

लेकिन उन्होंने खुद को साबित किया हर उस किरदार में जो उन्हें दिया गया कभी एक नर्म दिल पिताम कभी एक सख्त पुलिस ऑफिसर कभी एक डरा सहमा आम आदमी और कभी-कभी खामोशी से सब कोई सहता एक सच्चा प्रेमी मुकुल के अभिनय की अद्भुत सादगी थी जो उन्हें हर किसी के लिए रिलेटेबल बनाती थी भाई रब जाने माने भाई दिल्ली में जन्मे मुकुलदेव का बचपन बेहद अनुशासन में बीता उनके पिता एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी थे और घर में कड़क नियम कानून का पालन होता था लेकिन इसके साथ-साथ मुकुल के भीतर एक क्रिएटिव आग भी थी जिसे उन्होंने बचपन से ही पहचाना और स्कूल के नाटकों में हिस्सा लेकर चैन नहीं लिया बल्कि उन्होंने एनसीसी में भी दाखिला लिया जहां उन्होंने अनुशासन और नेतृत्व की कला सीखी उनकी यह ट्रेनिंग बाद में उनके अभिनय में भी झलकती रही हर किरदार में गहराई एक ठहराव बहुत कम लोग जानते हैं कि मुकुल देव एक ट्रेंड पायलट थे।

उन्होंने एयरक्राफ्ट उड़ाने की बकायदा ट्रेनिंग भी ली थी और एक समय उनके करियर का रास्ता पूरी तरह एिएशन की ओर था सनम तुम हम पे मरते हो मोहब्बत तुम भी कर कमर्शियल पायलट बनने के सभी औपचारिक प्रशिक्षण उन्होंने पूरे किए थे लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था फिल्म और कैमरे की दुनिया में उनका आना एक संयोग था एक स्क्रीन टेस्ट के जरिए उनके भाई राहुल देव पहले से ही मॉडलिंग और फिल्मों में सक्रिय थे और उन्होंने ही मुकुल को इस दिशा में धकेला एक स्क्रीन टेस्ट और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा मुकुल देव को पहला बड़ा ब्रेक फिल्म 10 से मिला जो तकनीकी कारणों से अधूरी रह गई लेकिन उनके अभिनय की गंभीरता और शालीनता ने इंडस्ट्री को चौंका दिया लगा जैसे इस वीरान दुनिया में मेरा भी कोई अपना है इसके बाद उन्होंने सुजान सिंह सोचा ना था मुझे कुछ कहना है आशिक बनाया आपने किस्मत सर हम तेरी कसम जैसी कई फिल्मों में काम किया वो हमेशा मुख्य भूमिका में नहीं होते थे।

लेकिन उनके किरदारों के बिना फिल्म अधूरी लगती थी उनकी आंखों में भावनाओं की लहर होती थी और उनके संवादों में एक ठोस सच्चाई टेलीविजन की दुनिया में भी मुकुल देवी एक जाना पहचाना नाम बन गए घरवाली ऊपर वाली कभी सौतन कभी सहेली कहता है दिल जैसे शो में उनकी भूमिकाएं दर्शकों के दिलों को छू गई उन्होंने रियलिटी शो फियर फैक्टर इंडिया को भी होस्ट किया था जहां उनका आत्मविश्वास और व्यवहारिक ज्ञान दर्शकों को खूब भाया उनकी आवाज में एक गरिमा थी जो उन्हें औरों से अलग बनाती थी हर फ्रेम में वह खुद को पूरी तरह से झोंक देते थे पंजाबी सिनेमा में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी जिंदुआ तेरे इश्क नचाया चले मुंडिया जैसी फिल्मों में उन्होंने अपने किरदारों में सच्चाई और गहराई भरी पंजाबी भाषा की मिठास और स्थानीय सांस्कृतिक की आत्मसात करते हुए उन्होंने ऐसी फिल्मों में काम किया जो क्षेत्रीय होते हुए भी सार्वभौमिक भावनाओं को छूती थी ।

उनके अभिनय में एक प्राकृतिक सहजता थी जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था शादी और निजी जीवन की बात करें तो मुकुल देव ने एक एयर होस्टेस से विवाह किया था इस रिश्ते से उन्हें एक बेटी हुई जो उनकी जिंदगी की धड़कन थी हालांकि समय के साथ उनके वैवाहिक जीवन में दरारें आ गई और दोनों अलग हो गए मुकुल ने कभी मीडिया में अपनी पत्नी के बारे में कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं की लेकिन हर बार जब उनसे बेटी के बारे में पूछा जाता उनकी आंखें भीग जाती वह अपनी बेटी के लिए जीते थे उनकी हर छोटी बड़ी जरूरत का ख्याल रखते थे उनकी बेटी ही उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा थी उनके निधन की खबर सबसे पहले एक फैन क्लब के जरिए सामने आई बताया गया कि उनका निधन दिल का दौरा पड़ने से हुआ वो मुंबई के अपने फ्लाइट में अकेले थे नौकरों से जब दरवाजा नहीं खुला तो पुलिस को बुलाया गया दरवाजा तोड़ा गया और अंदर मुकुल बेसुद्ध पड़े थे।

मेडिकल रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि उनका निधन कार्डियाक अरेस्ट से हुआ लेकिन असली सवाल यह था कि इतना संवेदनशील और जुड़ाव रखने वाला इंसान अपने आखिरी वक्त में इतना अकेला कैसे हो गया पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण हार्ट अटैक बताया गया लेकिन सवाल यह नहीं था कि उनकी मौत कैसे हुई सवाल यह था कि इतना बड़ा कलाकार आखिर अकेला क्यों रह गया यह हमारे समाज और इंडस्ट्री के उस चेहरे को दिखाता है जो अक्सर उन लोगों को भूल जाता है तितली के पंखों जैसी शबनम के मोती जैसी नाजुक है राह वफा जो सबसे ज्यादा चमक दमक नहीं चाहते उनके अंतिम संस्कार में फिल्म इंडस्ट्री से कुछ गिने-चुने चेहरे ही पहुंचे राहुल देव रोहित रॉय और कुछ पुराने टीवी कलाकार पर ना कोई मीडिया में ज्यादा कवरेज ना कोई लंबा ट्रिब्यूट सेगमेंट जैसे कि मुकुल देव कोई सामान्य इंसान थे ना कोई भव्य श्रद्धांजलि ना कोई सम्मान समारोह बस एक चुप्पी जो उनके जीवन की सच्चाई को बयान करती थी पर वह सामान्य नहीं थे मुकुल ने अपने पीछे लगभग ₹22 करोड़ की संपत्ति छोड़ी मुंबई की अंधेरी और गोरेगांव में उनके दो फ्लैट एक फार्म हाउस जो उन्होंने अपने रिटायरमेंट के लिए खरीदा था और कुछ निवेश इन सबकी कुल कीमत करोड़ों में थी शेयर मार्केट में उनका अच्छा खासा पोर्टफोलियो था और उन्होंने जीवन बीमा पॉलिसी के जरिए अपनी बेटी के लिए सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने की भी कोशिश की थी पर जो चीज सबसे अमूल्य थी वो था उनके द्वारा अर्जित मानसान और लोगों के दिलों में बसाई गई यादें उनकी बेटी जो फिलहाल 18 साल की है दिल्ली में पढ़ाई कर रही थी जब यह खबर आई बताया गया कि वह अपने पिता के बेहद करीब थी और अंतिम दिनों में मुकुल बार-बार उनसे मिलने दिल्ली जाना चाहते थे लेकिन शूटिंग शेड्यूल और तबीयत की वजह से यह मुमकिन नहीं हो पाया यह विडंबना ही है जो इंसान की पूरी जिंदगी अपनी बेटी की परछाई बनकर उसके पीछे खड़ा रहा वो आखिरी वक्त में उसकी आवाज भी नहीं सुन सका।

आज वो लड़की अकेली है ना मां के साथ रहना पसंद करती है ना ही पिता अब इस दुनिया में है उसकी आंखों में जो खालीपन है वो किसी भी कैमरे में नहीं दिखाया जा सकता वो सिर्फ महसूस किया जा सकता है हर उस इंसान के द्वारा जिसने कभी किसी अपने को खोया हो बॉलीवुड में कई कलाकारों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गॉन टू सून आरआईपी मुकुलदेव अ फाइन एक्टर अ जेंटल सोल लेकिन क्या सच में किसी ने उसे जिया क्या किसी ने उसकी कला को सराहा जब वो जिंदा था और वहां पे वहां पे लोग मुझे नोचने की कोशिश कर रहे थे आई डोंट वांट डाई रोहित यह सिर्फ पोस्ट एक औपचारिकता थी जैसे हर मौत के बाद की जाती है क्या फिल्म इंडस्ट्री ने कभी उसे सम्मान से देखा जो वह डिर्व करते थे क्या कभी उसे लाइट में देखा गया जो वह खुद दूसरों के लिए जलाता था।

मुकुल देव की कहानी दरअसल उन हजारों कहानियों का प्रतिनिधि है जिन्हें हम हर दिन नजरअंदाज करते हैं यह कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसने कभी ग्लैमर की चकाचौंध को अपने हुनर से बड़ा नहीं माना वो कभी शोहरत की उस रेस में नहीं दौड़ा जहां दूसरों को पीछे छोड़ने के लिए चालाकी ड्रामा और सेल्फ प्रमोशन की जरूरत होती है उसके लिए सफलता का मतलब था सच्चाई से किया गया हर किरदार वो अवार्ड्स के पीछे कभी नहीं भागा और ना ही पार्टीज और कैमरों के सामने दिखावा करने में विश्वास करता था उसे ना लाल कालीन पर चलने की ख्वाहिश थी और ना ही ट्रॉफी उठाकर भाषण देने की भूख उसे चाहिए था बस एक अच्छी स्क्रिप्ट एक सच्चा किरदार और कैमरे के उस पार बैठा एक दर्शक जिसकी आंखों में वो सच्चाई पढ़ सके जिसे वह झूठे संवादों में भी दिल की धड़कन महसूस करा सके जब मुगल पर्दे पर आता था तो दर्शकों को यह फर्क करना मुश्किल हो जाता था कि वो कोई किरदार देख रहा है या फिर किसी अपने से मिल रहा है उसकी संवाद अदायगी में बनावटीपन की जगह अनुभव था उसकी आंखों में सिर्फ एक्टिंग नहीं जिंदगी की थकान उम्मीद और खामोशियां होती थी वह ऐसे कलाकार थे जो कैमरों से नहीं बोलते थे वह दर्शकों की आत्मा से संवाद करते थे मुकुल देव की यही सादगी यही ईमानदारी और यही गहराई उन्हें आम अभिनेताओं से अलग बनाती थी वह किसी सूची में टॉप नहीं करते थे लेकिन दिलों की किसी गिनती में हमेशा मौजूद रहते थे उनकी निधन ने सिर्फ एक इंसान को हमसे नहीं छीना बल्कि एक आईना हमारे सामने रख दिया है जिसमें इंडस्ट्री की सबसे कड़वी सच्चाई साफ दिखती है यह एक ऐसा सवाल है जो हर संवेदनशील मन को झंझोर देता है कि क्या इसी फिल्मी दुनिया में वाकई वही लोग चमकते हैं जो ज्यादा बोलते हैं जो दिन रात सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं जिनकी हर चाल हर पहनावा हर बयान हेडलाइन बनता है क्या लोकप्रियता अब सिर्फ ट्रेंडिंग टैग्स और पब्लिकिसिटी स्टंट से तय होती है या फिर हम उन कलाकारों को भूल बैठे हैं जो कैमरे की चमक से ज्यादा कहानी की सच्चाई में विश्वास करते हैं जो इंस्टाग्राम के पोस्ट से नहीं पर्दे पर निभाए गए किरदारों से लोगों के दिलों में उतरते हैं जो हर दिन बिना किसी शोर के शूटिंग सेट पर पहुंचते हैं और अपना काम करते हैं और उसी खामोशी से चले जाते हैं जैसे कोई ईमानदार साधक अपना धर्म निभाकर लौटता है मुकुल देव जैसे कलाकार चुपचाप आते हैं कहानी असल बनाते हैं लेकिन हम उन्हें भुला देते हैं क्योंकि उन्होंने कभी अपने चेहरे को ब्रांड नहीं बनाया।

उन्होंने कैमरे के पीछे ज्यादा जिया स्क्रिप्ट के हाशियों में डायरेक्टर के विश्वास में और दर्शकों के दिलों में बिना खुद के लिए तालियां मांगे आज उनकी मौत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या सच में कलाकार को उनके हुनर से आकते हैं या फिर सिर्फ उनकी दृश्यता से हम आपको आपके घर छोड़ देते हैं थोड़ी देर और नहीं सकते क्या वो जो सच में अभिनय की आत्मा को जीते हैं हमारे बीच सिर्फ संख्याओं और रेटिंग्स के पीछे खो जाते हैं यह सवाल मुकुल देव के लिए एक श्रद्धांजलि नहीं बल्कि पूरी इंडस्ट्री के लिए एक चेतावनी है अगर हम चुप रहेंगे तो अगला मुकुल देव भी यूं ही चुपचाप चला जाएगा और हम सिर्फ एक आरआईपी पोस्ट लिखकर खुद को माफ कर लेंगे मुकुल देव एक रियल हीरो थे पर वो हीरो जो सिर्फ पर्दे पर नहीं असल जिंदगी में भी हर पल सच्चाई के साथ जिया उनके लिए एक्टिंग कोई पेशा नहीं था उनके लिए यह एक साधना थी एक ऐसा धर्म जिसे उन्होंने बिना दिखावे बिना शोरशराबे पूरी श्रद्धा से निभाया उन्होंने अभिनय को कभी लोकप्रियता पाने का जरिया नहीं बनाया बल्कि उसे आत्मनुशासन ईमानदारी और संवेदनशीलता का विस्तार माना उन्होंने कभी इस इंडस्ट्री में किसी से होड़ नहीं लगाई ना कभी किसी को नीचा दिखाने की कोशिश की ना किसी को मात देने की क्योंकि उनका विश्वास था कि उनकी हर कलाकार की अपनी जगह होती है और उस जगह को पाने के लिए लड़ाई नहीं निष्ठता चाहिए उनकी प्रतियोगिता सिर्फ खुद से थी कि वह आज कल से बेहतर हो और कल आज से भी ज्यादा सच्चे हर दिन वह खुद को थोड़ा और परिकृत करते थे थोड़ी और गहराई से जोड़ते और थोड़ी सच्चाई से जीते जैसे हर दिन नई फिल्म की तैयारी कर रहे हो जब वो चुपचाप इस दुनिया से चले गए तो किसी स्क्रिप्ट की तरह सब कुछ अधूरा छूट गया पीछे रह गई।

एक अधूरी स्क्रिप्ट जिसे अब कोई खत्म नहीं कर सकता एक बेटी जो उनकी दुनिया थी पर अब वो दुनिया ही नहीं रही कुछ चिट्ठियां जिसमें शायद अधूरे ख्वाब अनकहे जज्बात और एक बाप की सादगी भरी संवेदनाएं बंद थी और एक ऐसा खालीपन जिसे कोई शब्द कोई दृश्य कोई अभिनय कभी भर नहीं सकता यह खालीपन केवल उनके घर में नहीं बल्कि उस इंडस्ट्री में भी है जिसने उन्हें पर्याप्त नहीं पहचाना और उस दर्शक के दिल में भी जिसने उन्हें हमेशा पर्दे के कोनों में साइड किरदारों में देखा लेकिन कभी असल में उनकी आत्मा को नहीं जाना उनकी कहानी खत्म नहीं हुई है और शायद कभी होगी भी नहीं क्योंकि सच्चे कलाकारों की कहानी किसी कैलेंडर की तारीख पर खत्म नहीं होती वो हर उस दृश्य में जिंदा रहती हैं जिसमें उन्होंने अपना आत्मा उतार दी थी मुकुल देव आज भी जिंदा हैं हर उस फिल्म के फ्रेम में जहां उन्होंने अपनी आंखों से संवाद किया हर उस किरदार में जहां उन्होंने कैमरे के सामने नहीं बल्कि दर्शकों के दिल में अभिनय किया उनके बोले हुए हर डायलॉग में आज भी एक सच्चाई गूंजती है जो सिर्फ सुनाई नहीं देती महसूस होती है जब कोई दर्शक उनकी पर्दे पर मौजूदगी को देखता है तो वह यह नहीं कहता कि यह एक्टिंग है वह कहता है यह इंसान सच्चा है और यही मुकुल देव की सबसे बड़ी पहचान थी।

उन्होंने कभी अभिनय को दिखावे का साधन नहीं बनाया बल्कि उसे जीवन का विस्तार बना दिया कभी-कभी सबसे सच्चे किरदार फिल्म के स्क्रिप्ट में नहीं होते वह जिंदगी के उन कोनों में रहते हैं जहां कैमरे की रोशनी नहीं पहुंचती जहां ग्लैमर का कोई तामझाम नहीं होता वहां बस एक इंसान होता है मुकुल देव जैसा इंसान जो खामोशी से जीता है और उतनी ही खामोशी से अमर हो जाता है आज जब मुकुल हमारे बीच नहीं है तो उनकी अनुपस्थिति सिर्फ एक शारीरिक दूरी नहीं है यह हमारी कला हमारी संवेदनशीलता और हमारा सामाजिक रवैया पर एक सवाल है क्या हम सिर्फ तभी जागते हैं जब कोई कलाकार चला जाता है क्या हमें उसकी प्रतिभा की कदर सिर्फ तब होती है जब वह हमारे बीच नहीं रहता क्या हमें अपने कलाकारों को जीते जी वो इज्जत वो स्पेस और वो अपनापन देने की आदत कभी आएगी यह सवाल सिर्फ मुकुल देव के लिए नहीं यह हर उस कलाकार के लिए है जो इस दुनिया में बेहतर बनाने में अपने हिस्से की ईमानदारी छोड़ जाता है मुकुल देव के लिए सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं एक खामोश प्रणाम एक अंतिम सलाम उस कलाकार को जो पर्दे से ज्यादा जिंदगी में सच्चा था।

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